Monday, June 03, 2024

हाइकु कैसे लिखें

02-5-2024
हाइकु कैसे लिखें.... ?
बच्चों से कैसे लिखाएँ हाइकु… ?
हाइकु लिखने के लिए 7 सूत्र- 
हाइकु लिखने के लिए गृह कार्य...
वीडियो को बहुत ध्यान से देखें... हो सके तो 2 बार देखें.... हाइकु के जो उदाहरण वीडियो में दिए गए हैं उन्हें सुनें और विचार करें कि क्या आप के आस-पास ऐसी चीजें नहीं हैं? अवश्य हैं... 7 बिंदुओं को ठीक से समझें..... बच्चों को हाइकु लिखना सिखाने के लिए उन्हें एक बार वीडियो देखने को कहें....     
गृहकार्य के लिए जैसा वीडियो के अंत में बताया गया है वैसा करें और उसके अनुसार हाइकु लिखें..... तथा समूह में पोस्ट करें...... जो वाट्सप समूह में नहीं जुड़े हैं वे वीडियो के कमेंट सेक्शन में हाइकु लिख सकते हैं... चैनल को सब्सक्राइब करके इसे अधिकतम लोगों तक पहुँचाने में सहयोग करें।  

वीडियो को देखने के लिए क्लिक करें- 
                                                                                                                             
   
-डा. जगदीश व्योम

Thursday, April 25, 2024

कोट बर्फ़ का

कोट बर्फ़ का
पहने देवदार
पहरेदार 
 
    -अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर

Wednesday, April 24, 2024

पंछी खेलते

पंछी खेलते
रुपहली धरती
लगे अनूठी

    -स्नेहा देव 

रँगा गगन

रँगा गगन
बना ऐक्वेरियम
तैरें पतंगें

    -अनिल सक्सेना 

बनी अखाड़ा

बनी अखाड़ा 
राजनीतिक निष्ठा 
प्राण-प्रतिष्ठा 

    -अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

कठिन ऋतु

कठिन ऋतु
तैयार है जीवन
ज़िद जीने की

        -स्नेहा देव

अण्डे ग़ायब

अण्डे ग़ायब
बर्फ़ की पर्तों तले 
पक्षी निहारें 

    -माया बंसल 

बैंच पे लेटी

बैंच पे लेटी 
बतिया रही हिम 
नीरवता से 

    -आरती लोकेश  

ठूँठ कूटते

 ठूँठ कूटते 
नमक की डलियाँ 
मूसल बने

    -आरती लोकेश 

बिछी है बर्फ़

बिछी है बर्फ़
श्वांस को तरसती 
दूब बेचारी 

    -आलोक मिश्रा 

माँझे ने काटीं

माँझे ने काटीं 
बेशुमार पतंगें 
पक्षी के पर

-अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

बर्फ़ देखने

बर्फ़ देखने
उतरे धरा पर
आज परिंदे

    -अरुन शर्मा

ठण्डी सिंकाई

ठण्डी सिंकाई
झुलसे तन पर 
करती धरा

    -नितीन उपाध्ये

बदले चोला

बदले चोला 
तान श्वेत चादर 
धरा सुन्दरी

    -नितीन उपाध्ये

बर्फ़ ही बर्फ़

 बर्फ़ ही बर्फ़
अब धरती ने ली 
चैन की साँस

   -आलोक मिश्रा

शुभ्र चादर

 शुभ्र चादर 
बर्फ़ का ताना-बाना
सभी को ढके

    -आरती लोकेश 

बिछी हुई हैं

 बिछी हुई हैं
श्वेत नर्म चादरें 
पक्षी सिमटे 

    -रेणु चन्द्रा

रचे प्रकृति

रचे प्रकृति
सर्द उँगलियों से
उजला चित्र

    -प्रीति गोविंदराज

बर्फ़ का डेरा

 बर्फ़ का डेरा
पार्क की बेंचों पर
बैठे तो कहा

     -आलोक मिश्रा

बर्फ़ की मार

बर्फ़ की मार
चिड़ियों पर भारी
भूखी बेचारी 

      -आलोक मिश्रा 

बर्फ से ढँकी

 बर्फ से ढँकी 
चिनार की वादियाँ 
सन्नाटा व्याप्त

    -रंजना झा

बर्फ ही बर्फ

बर्फ ही बर्फ 
है सुनसान रास्ता 
आगे मंजिल 

    -मीरा ठाकुर

है बर्फ़बारी

 है बर्फ़बारी 
ये चिड़ियाँ बेचारी
भूख की मारी 

    -अनिल सक्सेना ज़ाहिर

वृक्षों के वस्त्र

 वृक्षों के वस्त्र
पत्ते, फूल  फल
छीने बर्फ़ ने

    -अनिल सक्सेना ज़ाहिर

पक्षी है मौन

 पक्षी है मौन
भारी हिमपात में 
निकले कौन

    -अनिल सक्सेना ज़ाहिर

देतीं धरना

 देतीं धरना
बर्फ़ पर चिड़िया
उजड़े घर 

    -अनिल सक्सेना ज़ाहिर

बर्फ़ ने छीने

 बर्फ़ ने छीने
फल फूल  पत्ते 
वस्त्र वृक्षों के

    -अनिल सक्सेना ज़ाहिर

सो रहे ओढ़े

 सो रहे ओढ़े
सफेद-सा लिहाफ़
छुपे चिनार 

    -अनिल सक्सेना ज़ाहिर

छाया विषाद

 छाया विषाद 
बर्फ है चारों ओर 
मन व्याकुल 

    - मीरा ठाकुर 

मिले न दाना

 मिले  दाना
बर्फ  है आच्छादित
पाखी चिंतित

    -अमिता शाह अमी

दाना अदृश्य

 दाना अदृश्य
बर्फ बनी दुश्मन
भूख दमन
    
    -अमिता शाह अमी

ज्यूँ बरगद

 ज्यूँ बरगद
संविधान भी देता
सभी को छाँव 

    -आलोक मिश्रा

शबरी कुटी

शबरी कुटी 
बस भाये राम को 
 स्वर्ण लंका 

    -नितीन उपाध्ये 

राम का घर

राम का घर
जनमानस मन
शालिग्राम भी 

    -अनिल सक्सेना ज़ाहिर

अग्नि परीक्षा

अग्नि परीक्षा 
राजनीतिक निष्ठा 
राम राज्यकी

    -अनिल सक्सेना ज़ाहिर

राम ने खींची

राम ने खींची 
उत्तम मर्यादा की
लक्ष्मण रेखा

    -अनिल सक्सेना ज़ाहिर

जानते पत्ते

जानते पत्ते 
जब गिरें टूट के 
रिश्तों का दर्द
 
    -अनिल सक्सेना ज़ाहिर

पेड़ों के साये

पेड़ों के साये 
छुप के निहारते 
सलोनी संध्या

    -अनिल सक्सेना ज़ाहिर

धुंध लपेटे

धुंध लपेटे 
बुझी मोमबत्ती-सा
खड़ा सूरज

    -अनिल सक्सेना ज़ाहिर

चली बयार

चली बयार
खिलखिलाए फूल
लजाई कली

    -अनिल सक्सेना ज़ाहिर

कोहरा छाये

कोहरा छाये
रिश्तों में गर्मी नहीं
मन जलाये

    -अमिता शाह-'अमी'

समेट लेती

समेट लेती
धेरे की चादर
रात सवेरे 

  -नितीन उपाध्ये 

सार्थक शब्द

सार्थक शब्द 
दिशाएँ बदलते 
चोट करते

-दुर्गा सिन्हा उदार

शुद्धता पूर्ण

शुद्धता पूर्ण 
बर्फ़ीली है चादर 
जल-कण की 
-दुर्गा सिन्हा उदार  

नन्हा-सा दिया

 नन्हा-सा दिया 

कितना उपकारी 

तम पे भारी 


-अनिल सक्सेना ज़ाहिर

कोने में पड़े

कोने में पड़े 

रात भर जो लड़े 

तम से दिये

-अनिल सक्सेना ज़ाहिर 

चूहे खा गए

चूहे खा गए 

पर जी भर जिए 

आटे के दिये

-अनिल सक्सेना ज़ाहिर 

रँगा गगन

 गा गगन

बना ऐक्वेरियम

तैरें पतंगें

-अनिल सक्सेना ज़ाहिर 

तार में फँसी

तार में फँसी 
फड़फड़ाती रोती
कटी पतंग

-अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

डोरी तगड़ी

डोरी तगड़ी 
बांध उमंग सेतु 
पतंग उड़ी 
-पूजा अनिल

उड़ें साथ में

उड़ें साथ में 
पतंग नई कोरी 
मांझा कड़क 

-पूजा अनिल

मनु संतान

मनु संतान 
राम के नाम पर
फोड़ते सिर
-अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

राम ने खींची

राम ने खींची 
उत्तम मर्यादा की
‘लक्ष्मण रेखा’
-अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

टिकता न हो

टिकता न हो
भेद धर्म, नस्ल का
वो धरा कहाँ?

-प्रीति गोविंदराज

बर्फीली हवा

बर्फीली हवा
पर्ण विहीन पौधे
चट्टानें चीखें
-आरती परीख

संध्या बनाए

संध्या बनाए
हर शाम रंगोली 
आसमान में 
-आलोक मिश्रा

भूखा बालक

भूखा बालक 
कातर-सी निगाहें 
दोषी जगत 
    -शालिनी वर्मा 

सूर्य किरणें

सूर्य किरणें
दुपट्टे में लपेट
ढलती साँझ
    -आरती परीख

काटे फसल

काटे फसल 
नभ में बादलों की 
चाँद-हँसिया   
  -नितीन उपाध्ये

संध्या फलक

संध्या फलक
क्षितिज के मस्तिष्क
सूर्य तिलक
    -आरती परीख

छत पे पड़ी

छत पे पड़ी 
गिनती रही तारे
सपने बुने
    -रंजना झा

सीप में गिरी

सीप में गिरी 
मोती में ढल गई 
पानी की बूँद
-रंजना झा

भोर की बेला

भोर की बेला
मुंडी उठाये खड़ा
सूरजमुखी
-आरती परीख

फागुनी हवा

फागुनी हवा
रंगोत्सव का नशा
मौसम जवां
-आरती परीख

छाँव ना पानी

छाँव ना पानी
कहाँ जाए बेचारी 
प्यासी गौरैया 
  -आलोक मिश्रा

खाना बनाते

खाना बनाते 
आँगन बुहारते 
गाती थी अम्मा 
-नितीन उपाध्ये 

तार पे बैठी

तार पे बैठी
नन्ही गौरैया 
आस छाँव की 
-अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

हुआ दीवाना

हुआ दीवाना 
बादल बिजली का 
फूट के रोया 
-अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

नभ की फेरी

नभ की फेरी
पतंग और डोरी
वो जोरा जोरी
-अमिता शाह 'अमी'

जल का स्तर

जल का स्तर 
जा बैठा पाताल में 
मुँह छुपा के
    -रंजना झा

छुप के रवि

छुप के रवि
बादल से झाँकता
धरा की छवि
-अमिता शाह 'अमी'

चिपकी यादें

चिपकी यादें 
पुरानी हवेली की 
भूत-सी आतीं  
-माया बंसल 

धरा पे खड़ा

धरा पे खड़ा 
वृक्ष करता वार्ता 
आसमान से 
-माया बंसल 

फिंके धरा पे

फिंके धरा पे
फिर से उग आए
निचुड़े आम
-अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

बाढ़ ढूँढती

बाढ़ ढूँढती 
ग़रीबों के छप्पर 
बुलडोज़र
-अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

मेघों के ढोल

मेघों के ढोल
नाचतीं सब बूँदे 
गोल-मटोल 
-अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

खेत हैं प्यासे

खेत हैं प्यासे 
लिए वर्षा की आस
मेघ दे झाँसे
-अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

बाँसरी गूँजे

बाँसरी गूँजे
बह रही पवन
वृंदा के वन
-अमिता शाह-'अमी'

आकार नहीं

आकार नहीं 
विचार रावण के 
करो दहन
-अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

ख़ुश मत हो

ख़ुश मत हो
मात्र पुतला जला
रावण नहीं 
-आलोक मिश्रा

जले पटाखे

जले पटाखे 
फैला तम चादर 
गगन रोया
    -रंजना झा 

शाम ढलती

शाम ढलती 
आगाह कर रही 
जीवन संध्या 
-दुर्गा सिन्हा ‘उदार

घुला जहर

घुला जहर 
धुआँ धुआँ शहर 
कैसी दीवाली
    -रंजना झा

तपी हवाएँ

तपी हवाएँ 
आम के बौर संग
गमक जाएँ 
-अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

यह भी खूब

यह भी खूब 
आँधी व तूफ़ान से
जीतती दूब
-अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

आम का पेड़

आम का पेड़
पके पीले केसरी
डालियाँ भरी
-अमिता शाह 'अमी'

झील छुपी है

झील छुपी है 
नैनों की नगरी में 
पानी है खारा 
-अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

आँधी ने चखे

आँधी ने चखे
इमली और आम
खटमिट्ठे से
-अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

पड़ते ओले

पड़ते ओले 
कृषक-हृदय पे
तोप के गोले 
    -अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

मधुमक्खियाँ

मधुमक्खियाँ 
करें पराग-चोरी 
चढ़ा के त्योरी 
-अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

Monday, April 22, 2024

धरा पे खड़ा

धरा पे खड़ा 
आकाश छूना चाहे 
उत्साही वृक्ष

-माया बंसल 

Saturday, January 27, 2024

छाया विषाद

छाया विषाद 
चारों ओर है बर्फ़
मन व्याकुल 

-मीरा ठाकुर 
   

पक्षी हैं मौन

पक्षी हैं मौन
भारी हिमपात में 
निकले कौन 

-डा॰ अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’
दुबई।

देतीं धरना

देतीं धरना
बर्फ़ पर चिड़ियाँ
उजड़े घर 

-डा॰ अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

Tuesday, January 23, 2024

अंतर्मन में

अंतर्मन में
है निवास प्रभु का 
अंदर झाँक 

-अन्नदा पाटनी 

Sunday, January 21, 2024

पेड़ों के साये

पेड़ों के साये 
छुप के निहारते 
सलोनी संध्या

-डा॰ अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

Friday, January 19, 2024

समेट लेती

समेट लेती
अंधेरे की चादर
रात सवेरे 

-डॉ. नितीन उपाध्ये

चूहे खा गए

चूहे खा गए 
पर जी भर जिए 
आटे के दिये 

-डा॰ अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

कोने में पड़े

कोने में पड़े 
रात भर जो लड़े 
तम से दिये

 -डा॰ अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

Thursday, November 30, 2023

व्यस्त सड़क

व्यस्त सड़क
गंतव्य से अज्ञात
भागते लोग

-मनीष श्रीवास्तव

Sunday, November 26, 2023

लम्बे छोटे से

लम्बे छोटे से
रास्ते जीवन भर
साथ चलना

-अंजू घरभरन

लगी है झड़ी

लगी है झड़ी
आये वो याद मुझे
खनके चू़ड़ी

-अंजू घरभरन

Friday, September 15, 2023

पाँव चाँद पे

पाँव चाँद पे
लहराये तिरंगा 
बड़े शान से 

-डा॰ अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

रहे झूलती

रहे झूलती 
जोड़ कर दो कुल  
पुल सी नारी 

-डॉ. नितीन उपाध्ये 

Wednesday, August 09, 2023

आयी बरखा

आयी बरखा
संतुष्ट है प्रकृति
खिली वसुधा
    -रिपल व्यास 
(अबु धाबी)

चाँद को टाँगा

 
चाँद को टाँगा
बनाकर कंडील
आसमान ने 
    -मधु शर्मा
   (न्यूयार्क)

Wednesday, August 02, 2023

घर पे रुके

घर पे रुके
बारिश के बंधक
चले पकौड़े 

-डा॰ अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

Sunday, July 30, 2023

पिता चट्टान

पिता चट्टान
अनिश्चितता दूर
पथ सुगम
   -नीलू गुप्ता

लौटातीं साँसें

लौटातीं साँसें
कुम्हलाए पत्तों में 
वर्षा की बूँदें
          -मंजु मिश्रा

Sunday, July 16, 2023

मेघ ने डाँटा

मेघ ने डाँटा 
खिसियानी सी धूप 
हवा हो गई 

-डा॰ अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

Wednesday, July 12, 2023

तुम्हारा प्यार

तुम्हारा प्यार
खोलता अनदिखे
ज्योति के द्वार!

-शैलजा सक्सेना

याद बारिश

याद-बारिश
भीगता मन हुआ
मन भर का

-शैलजा सक्सेना

भाग्य रेखा से

भाग्य-रेखा से
धरा की हथेली पे
पेड़ की जडें  

-शैलजा सक्सेना

Thursday, July 06, 2023

चलीं चीटियाँ

चलीं चीटियाँ 
सिर पे लादे अन्न 
वर्षा से खिन्न 

-डा॰ अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

Wednesday, June 21, 2023

संक्षिप्त मृत्यु

संक्षिप्त मृत्यु
रोज़ चली आती है
नींद बन के!

-डॉ. शैलजा सक्सेना

बरसीं यादें

बरसीं यादें
भीगता मन हुआ
मन भर का! 

-डॉ. शैलजा सक्सेना

भँवरे सुनाएँ

भँवरे सुनाएँ
मधु-पत्र प्रिय का
हवा मुस्काए!

-डॉ. शैलजा सक्सेना

रोने भी दे

रोने भी दे
क्यों चिपकाऊँ व्यर्थ
मुस्कान झूठी!

-डॉ. शैलजा सक्सेना

कूका बसंत

कूका बसंत
क्यारियाँ मुस्कुराईं
महकी हवा

-डॉ. शैलजा सक्सेना

गद्य जीवन

गद्य जीवन
कवितामय तुम हो
गाऊँ तो कैसे! 

-डॉ. शैलजा सक्सेना

देश-देश में

देश-देश में
ढूँढ रहा ख़ुद को
प्रवासी मन! 

-विनीता तिवारी

बहता पानी

बहता पानी
दम्भ-द्वेष से परे
देता जीवन! 

-विनीता तिवारी

प्रेम-उन्माद

प्रेम-उन्माद
बहा लाया नदी को
सिन्धु किनारे! 

-विनीता तिवारी

नदी किनारे

नदी किनारे
पनपीं सभ्यताएँ
रचीं ऋचाएँ

-विनीता तिवारी

त्वचा बेहाल

त्वचा बेहाल
रसायनों से लाल
कैसा गुलाल

-विनीता तिवारी

अकेली धरा

अकेली धरा
झेल रही कब से
विकास क्रम

-विनीता तिवारी

समृद्ध देश

समृद्ध देश 
कुंठा फिर भी शेष
श्वेत-अश्वेत

-विनीता तिवारी

सघन वृक्ष

सघन वृक्ष
झाँकने आ जाती है
कोमल धूप 

-प्रगति टिपणीस

Friday, June 16, 2023

उठा ले जातीं

उठा ले जातीं 
पहाड़ शक्कर के
नन्ही चींटियाँ 

-डा॰ अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

तपती रेत

तपती रेत 
चलते नंगे पाँव 
सीप व घोंघे 

-डा॰ अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

स्कूल की बस

स्कूल की बस
चहल पहल सी
खुशबू फूल

-मीरा ठाकुर

Wednesday, June 14, 2023

पहाड़ी देश

पहाड़ी देश
अँगड़ाइयाँ लेती
सड़क खड़ी

-आरती परीख

कैसे उठाऊँ

कैसे उठाऊँ
छड़ी अपने हाथ 
बच्चों के आगे

-नितीन उपाध्ये

Thursday, June 08, 2023

प्रवासी जन

प्रवासी जन
बहती जलकुंभी 
जम ना पाए 

-डा॰ अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

भूलभुलैया

भुलभुलैया
निकलना कठिन
जीवन-चक्र 

-डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘उदार‘

Wednesday, June 07, 2023

रिश्तों के बीच

रिश्तों के बीच
गठानें हैं कितनी
दूरी इतनी

-अमिता शाह 'अमी'

हरसिंगार

हरसिंगार! 
हुआ क्या बीती रात ?
बिखरे फूल 

-डा॰ अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

नन्हें हाथों में

नन्हें हाथों में
हँसिया-हथौड़िया
क्यों नहीं स्कूल? 

-नितीन उपाध्य

ओढ़े दरख़्त

ओढ़े दरख़्त 
कम्बल कोहरे के
खड़े संन्यासी 

-डा॰ अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

जुगनू डरें

जुगनू डरें 
सोसाइटी-लॉन में 
दीप जलाते

-डा॰ अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

Tuesday, June 06, 2023

भूलो न मुझे

भूलो न मुझे
घर की गौरेया हूँ
कहाँ आँगन? 

-माया बंसल

धुँधली शाम

धुँधली शाम 
छुपाता मुँह सूरज 
फ़्लैटों के पीछे 

-डा॰ अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

ताकें चिड़ियाँ

ताकें चिड़ियाँ 
डाइनिंग टेबल 
बालकनी से 

-डा॰ अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

Saturday, June 03, 2023

निगल रहीं

निगल रहीं 
पक्षी के कलरव 
अट्टालिकाएँ 

-डा॰ अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’

कृतघ्न नर

कृतघ्न नर
बुझा दिए दीपक
सूर्य आते ही 

-डॉ. नितीन उपाध्ये 

बाल सूर्य से

बाल सूर्य से 
रात भर था कहाँ ?
पूछती उषा 

-डॉ. नितीन उपाध्ये 

Friday, June 02, 2023

ठहरे हम

ठहरे हम
उम्र की पगडंडी
देखती राह

-अन्जना 'अनजान'

तुम हो साथ

तुम हो साथ
हो जाये कुछ बात,
बीते ये रात

-अन्जना 'अनजान'