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Monday, May 12, 2025
भरी सड़क
भरी सड़क
नहीं कहीं संवाद
लड़ते लोग
-डॉ. अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’
Thursday, April 25, 2024
कोट बर्फ़ का
कोट बर्फ़ का
पहने देवदार
पहरेदार
-अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर
Wednesday, April 24, 2024
रँगा गगन
रँगा गगन
बना ऐक्वेरियम
तैरें पतंगें
-अनिल सक्सेना
बनी अखाड़ा
बनी अखाड़ा
राजनीतिक निष्ठा
प्राण-प्रतिष्ठा
-अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’
माँझे ने काटीं
माँझे ने काटीं
बेशुमार पतंगें
पक्षी के पर
-अनिल सक्सेना ‘ज़ाहिर’
है बर्फ़बारी
है
बर्फ़बारी
ये
चिड़ियाँ
बेचारी
भूख
की
मारी
-
अनिल
सक्सेना
‘
ज़ाहिर
’
पक्षी है मौन
पक्षी
है
मौन
भारी
हिमपात
में
निकले
कौन
-
अनिल
सक्सेना
‘
ज़ाहिर
’
वृक्षों के वस्त्र
वृक्षों
के
वस्त्र
पत्ते
,
फूल
व
फल
छीने
बर्फ़
ने
-
अनिल
सक्सेना
‘
ज़ाहिर
’
देतीं धरना
देतीं
धरना
बर्फ़
पर
चिड़िया
ँ
उजड़े
घर
-
अनिल
सक्सेना
‘
ज़ाहिर
’
बर्फ़ ने छीने
बर्फ़
ने
छीने
फल
फूल
व
पत्ते
वस्त्र
वृक्षों
के
-
अनिल
सक्सेना
‘
ज़ाहिर
’
सो रहे ओढ़े
सो
रहे
ओढ़े
सफेद
-
सा
लिहाफ़
छुपे
चिनार
-
अनिल
सक्सेना
‘
ज़ाहिर
’
राम का घर
राम
का
घर
जनमानस
मन
शालिग्राम
भी
-
अनिल
सक्सेना
‘
ज़ाहिर
’
अग्नि परीक्षा
अग्नि
परीक्षा
राजनीतिक
निष्ठा
‘
राम
राज्य
’
की
-
अनिल
सक्सेना
‘
ज़ाहिर
’
राम ने खींची
राम
ने
खींची
उत्तम
मर्यादा
की
‘
लक्ष्मण
रेखा
’
-
अनिल
सक्सेना
‘
ज़ाहिर
’
जानते पत्ते
जानते
पत्ते
जब
गिरें
टूट
के
रिश्तों
का
दर्द
-
अनिल
सक्सेना
‘
ज़ाहिर
’
पेड़ों के साये
पेड़ों
के
साये
छुप
के
निहारते
सलोनी
संध्या
-
अनिल
सक्सेना
‘
ज़ाहिर
’
धुंध लपेटे
धु
ंध
लपेटे
बुझी
मोमबत्ती
-
सा
खड़ा
सूरज
-
अनिल
सक्सेना
‘
ज़ाहिर
’
चली बयार
चली
बयार
खिलखिलाए
फूल
लजाई
कली
-
अनिल
सक्सेना
‘
ज़ाहिर
’
कोने में पड़े
कोने
में
पड़े
रात
भर
जो
लड़े
तम
से
दिये
-
अनिल
सक्सेना
‘
ज़ाहिर
’
नन्हा-सा दिया
नन्हा
-
सा
दिया
कितना
उपकारी
तम
पे
भारी
-
अनिल
सक्सेना
‘
ज़ाहिर
’
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