खोती अस्तित्व
मिलती सागर में
नदी जाने क्यों
-शीतल जैन
पकी अमियाँ
पेड़ से टूट गिरी
मैना उदास
-शीतल जैन
शाम के माथे
चमके चम-चम
चाँद की बिंदी
-शीतल जैन
पीली चिड़िया
दाना खोजने उड़ी
लौटी क्यों नहीं?
-शीतल जैन
चींटीं चलतीं
कतार बनाकर
पूरी मिलिट्री
-शीतल जैन
बारिश बन
पेड़ों के पत्तों पर
गिरती रात
-शीतल जैन
मकड़ी जैसे
बुनती मानवता
भ्रम का जाल
-शीतल जैन
सूरज मौन
साँझ की तुरपन
करेगा कौन
-शीतल जैन
रफ़ू करती
सूरज की परतें
दर्जिन साँझ
-शीतल जैन
रीसायक्लिंग
सही अर्थ बताता
बया का नीड़
-शीतल जैन
निर्भय खग
सड़कों पर दौड़े
इंसान कैद
-शीतल जैन
कोयल कूके
बिछड़ा साथी ढूँढ़े
कातर मन
-शीतल जैन
काँधों पे लादे
सूरज की पोटली
साँझ निढाल
–शीतल जैन