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Monday, September 05, 2022

छूकर होंठ

छूकर होंठ
दहके हैं पलाश
गुलमोहर !
-राकेश खण्डेलवाल

उगाती धूप

उगाती धूप
फिर ले आती यादें
प्रभाती स्वर
-राकेश खण्डेलवाल

अँधेरे रहे

अँधेरे रहे
लगता सवेरा रुका
दूर पूर्व में
-राकेश खण्डेलवाल