दौड़ें माँ-बाप
राह ताकते बच्चे
धन की होड़!
-शोनाली श्रीवास्तव
कर्मों का खेल
मजदूर दिवस
रोज़ मनाये
-शोनाली श्रीवास्तव
जीवन एक
अनेक मृगतृष्णा
सदैव प्यासी
-शोनाली श्रीवास्तव
मध्य रात्रि में
नयन पूछ रहे
नींद का पता
-शोनाली श्रीवास्तव
खुला आसमाँ
शिला-झील का जाल
गगन तले
-शोनाली श्रीवास्तव
तीन बतखें
अपने नन्हे रत्न
झील में खोजें
-शोनाली श्रीवास्तव
जोगी पहाड़
अंग लगाये भस्म
चिलम फूँके
-शोनाली श्रीवास्तव
निर्जन पथ
लुढ़कती पत्तियाँ
भोर की बेला
-शोनाली श्रीवास्तव
पाँव घुँघरू
बाँधकर चली मैं
मन की गली
-शोनाली श्रीवास्तव
कड़क ठंड
लकड़ी से उड़ता
सफेद धुआँ
–शोनाली श्रीवास्तव