हौसला ज़िन्दा
समंदर को लाँघे
नन्हा परिंदा
-कृष्णा वर्मा
हवा छिछोरी
छेड़े कली बेबस
सिहरी जाए
-कृष्णा वर्मा
हरी ओढ़नी
रँगी कशीदाकारी
क्या फुलवारी
-कृष्णा वर्मा
लटक रही
पेड़ों पे कुहासे की
साँवली सौंर
-कृष्णा वर्मा
भोर ने ओढ़ा
कोहरे का दुपट्टा
धूप नाराज़
-कृष्णा वर्मा
रोज जन्मती
रात की कोख एक
नया सूरज
-कृष्णा वर्मा
पर्वत रोया
दर्द जो पिघला तो
फूटा झरना
-कृष्णा वर्मा
पत्तों के कानों
हवा फुसफुसाए
लोक कथाएँ
-कृष्णा वर्मा
नदी जल में
नहा के हवाएँ दें
सूर्य को अर्घ्य
-कृष्णा वर्मा
तोड़ती रही
झरनों की पायल
घाटी का मौन
-कृष्णा वर्मा
थामे उजास
पेड़ की फुनगी पे
लटका चाँद
-कृष्णा वर्मा
जन्मीं कोंपलें
मतवाली शाखाएँ
सोहर गायें
-कृष्णा वर्मा
आँखों की नमी
बंजर न होने दे
रिश्तों की जमीं
-कृष्णा वर्मा