बिछी हुई हैं
श्वेत नर्म चादरें
पक्षी सिमटे
-रेणु चन्द्रा
बोया पीपल
देश याद आया
मन मुस्काया
-रेणु चन्द्रा माथुर
नील गगन
बादलों का है डेरा
मन चितेरा
-रेणु चन्द्रा माथुर
आँसू कहते
अबोले रह कर
मन की बात
-रेणु चन्द्रा माथुर
चुप हैं रिश्ते
साथ मेरे थे कभी
मौन पसरा
-रेणु चन्द्रा माथुर
जलते पाँव
तपती है डगर
दूर है गाँव
-रेणु चन्द्रा माथुर
रंग बदल
मँडराती फूलों पर
हमिंग बर्ड
-रेणु चन्द्रा माथुर
भोर हुई तो
सड़क दौड़ पड़ी
चिन्ता लेकर
-रेणु चन्द्रा माथुर
याद आती है
माँ के हाथ की रोटी
परदेस में
-रेणु चन्द्रा माथुर
साँझ ढलते
साँझा चूल्हा जलता
मेरे आँगन
-रेणु चन्द्रा माथुर
साँझ की बेला
देहरी पर जला
आस का दीया
-रेणु चन्द्रा माथुर
शाख से टूटे
फिर बिछुड़ जाते
ये पीले पत्ते
-रेणु चन्द्रा माथुर
यादों के पाँखी
मन–नदी किनारे
अक्सर डोलें
-रेणु चन्द्रा माथुर
भोर हो गयी
प्रेमगीत सुनाती
नन्ही चिड़िया
-रेणु चन्द्रा माथुर
धरा ने ओढ़ा
कोहरे का कम्बल
काँपता मन
-रेणु चन्द्रा माथुर
थकी-सी भोर
अलसायी पसरी
हरी दूब पे
-रेणु चन्द्रा माथुर
खिचीं दीवारें
हो गये बँटवारे
कुछ न बचा
-रेणु चन्द्रा माथुर
अँधेरी रात
बेखौफ घूमती है
हवा आवारा
-रेणु चन्द्रा माथुर