महत्वाकांक्षा
खिंचती जाती डोर
कटी पतंग
-आराधना झा श्रीवास्तव
रोटी की भूख
चुकाती रहती है
जीने का मोल
-आराधना झा श्रीवास्तव
लहरें लेतीं
तट पर आकर
रेत समाधि
-आराधना झा श्रीवास्तव
लाँघते सीमा
ढूँढते रोज़गार
हम प्रवासी!
-आराधना झा श्रीवास्तव
कुम्हलाई-सी
गमले में ढूँढ़ती
अपना घर
-आराधना झा श्रीवास्तव
बर्फ़ का बोझ
विदा हुआ बसंत
मौन हवेली
-आराधना झा श्रीवास्तव
लहरें लेतीं
तट पर आकर
रेत समाधि!
-आराधना झा श्रीवास्तव
सँभाले हुए
गृहस्थी गोवर्धन
कृष्ण से पिता
-आराधना झा श्रीवास्तव
गंगा का तट
बनारस की शाम
बैरागी मन
-आराधना झा श्रीवास्तव
नीली डोली में
विदा होती धरती
क्षितिज पर
-आराधना झा श्रीवास्तव
कानों में डाले
सुवासित झुमके
लजाती डाली
-आराधना झा श्रीवास्तव
अहं की छौंक
बिगाड़ती ज़ायक़ा
बेस्वाद रिश्ते
-आराधना झा श्रीवास्तव
रोया पहाड़
फूट पड़ा सैलाब
हम भी रोये
-आराधना झा श्रीवास्तव
अँजुरी भर
मायके का दुलार
माँ का खोंइचा
-आराधना झा श्रीवास्तव
प्रवासी आत्मा
देह में तलाशती
अपना घर
-आराधना झा श्रीवास्तव
वृत्त में क़ैद
गोल गोल घूमती
धूरी बनी माँ !
-आराधना झा श्रीवास्तव
किसने खायी ?
चाँद की आधी रोटी
बादल मौन!
-आराधना झा श्रीवास्तव
कैसे ढूँढोगे?
झूठ के सागर में
बूँद-सा सच !
-आराधना झा श्रीवास्तव