देश-देश में
ढूँढ रहा ख़ुद को
प्रवासी मन!
-विनीता तिवारी
बहता पानी
दम्भ-द्वेष से परे
देता जीवन!
-विनीता तिवारी
प्रेम-उन्माद
बहा लाया नदी को
सिन्धु किनारे!
-विनीता तिवारी
नदी किनारे
पनपीं सभ्यताएँ
रचीं ऋचाएँ
-विनीता तिवारी
त्वचा बेहाल
रसायनों से लाल
कैसा गुलाल
-विनीता तिवारी
अकेली धरा
झेल रही कब से
विकास क्रम
-विनीता तिवारी
समृद्ध देश
कुंठा फिर भी शेष
श्वेत-अश्वेत
-विनीता तिवारी
गर्माया दिन
रेशम-सी लिपटी
बर्फीली रात
-विनीता तिवारी
चली ज़बान
कैंची सी कच-कच
उधड़े रिश्ते
-विनीता तिवारी
अमेरिका
झूठ पाखण्ड
डुबकी लगाकर
हुए पावन
-विनीता तिवारी
बिकते रहे
स्वर्णिम लिफ़ाफ़ों में
मानव-मूल्य
-विनीता तिवारी
रिश्तों की जमीं
बिना प्यार विश्वास
रही उजाड़
-विनीता तिवारी
परिवर्तन
प्रकृति का नियम
आसक्ति कैसी
-विनीता तिवारी
बहती नदी
बहा लायी यादों का
अस्थि कलश
-विनीता तिवारी
जनजीवन
आस्था की बलि चढ़ा
रोयी नदी भी
-विनीता तिवारी
कहाँ सम्भव!
दायरों में रहते
ऊँची उड़ान
-विनीता तिवारी
अहम मेरा
जागा रहा हमेशा
सोती रही मैं
-विनीता तिवारी