बूँदें टपकीं
लहरें भी गा उठीं
नदिया झूमी!
-कल्पना लालजी
बताती नहीं
कब रुख मोड़ ले
बेदर्द हवा!
-कल्पना लालजी
ठोकर खातीं
बेजु़बान लहरें
रोते पत्थर!
-कल्पना लालजी
ऊँचे पर्वत
छू लेते अम्बर को
बढ़ा के हाथ
-कल्पना लालजी
आँधियाँ यहाँ
बोलती हैं हमला
सपनों पर
-कल्पना लालजी