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Thursday, September 15, 2022

बूँदें टपकीं

बूँदें टपकीं
लहरें भी गा उठीं
नदिया झूमी!
-कल्पना लालजी

बताती नहीं

बताती नहीं
कब रुख मोड़ ले
बेदर्द हवा!
-कल्पना लालजी

ठोकर खातीं

ठोकर खातीं
बेजु़बान लहरें
रोते पत्थर!
-कल्पना लालजी

ऊँचे पर्वत

ऊँचे पर्वत
छू लेते अम्बर को
बढ़ा के हाथ
-कल्पना लालजी

आँधियाँ यहाँ

आँधियाँ यहाँ
बोलती हैं हमला
सपनों पर
-कल्पना लालजी