अण्डे ग़ायब
बर्फ़ की पर्तों तले
पक्षी निहारें
-माया बंसल
चिपकी यादें
पुरानी हवेली की
भूत-सी आतीं
-माया बंसल
धरा पे खड़ा
वृक्ष करता वार्ता
आसमान से
-माया बंसल
धरा पे खड़ा
आकाश छूना चाहे
उत्साही वृक्ष
-माया बंसल
भूलो न मुझे
घर की गौरेया हूँ
कहाँ आँगन?
-माया बंसल
सूर्य की छवि
निरखने को रुकीं
गंगा में नावें
-माया बंसल
तट देखते
नदी की अठखेली
ख़ामोश पड़े
-माया बंसल
गंध बिखेर
रातरानी करती
प्रिय-प्रतीक्षा
-माया बंसल
पीपल संत
ना मिले दाना-पानी
धूप में खुश
-माया बंसल
मेघ चँदोवा
बिछी फेन चादरें
व्हेल्स की सभा
-माया बंसल
सिखातीं हमें
समूह-प्रबंधन
मधुमक्खियाँ
-माया बंसल
मयूर-नृत्य
थिरकते पंखों में
अंग-प्रत्यंग
-माया बंसल
सूर्य उगता
डूबता भी है रोज
प्रारम्भ-अंत
-माया बंसल
ब्लू ज़े बर्ड है
फुर्तीली, नख़रीली
खाये, बिखेरे
-माया बंसल
प्यासी धरती
खींच लाती मीलों से
स्नेह की वर्षा
-माया बंसल
माँ पृथ्वी घूमें
चकरघन्नी सी ही
जीवन भर
-माया बंसल
तुरुप देती
फटे रिश्तों को दादी
बिना सुई के
-माया बंसल
सर्दी की धूप
चंचल बच्ची बन
दौड़ाती पीछे
-माया बंसल
सूर्य मेरा है
चिढ़ाता है पर्वत
नीचे वालों को
-माया बंसल
कैसी ये सजा
उल्टे खडे़ हैं वृक्ष
सरोवर में!
-माया बंसल