चक्कर ही है
देश या परदेश
दो रोटी का
-मंजू कुमार
दिन कटे हैं
नहीं कटती शामें
ये अकेलापन
-मंजू कुमार
परदेस में
पहरावा बदला
संस्कार नहीं
-मंजू कुमार
बढ़ती उम्र
याद आयें बहुत
अपने लोग
-मंजू कुमार
पानी में दिखा
अपना प्रतिबिम्ब
लगा मॉ का है
-मंजू कुमार
कोरल रीफ़
लुकाछुपी खेलती
नन्ही मछली
-मंजू कुमार
पक्षी ढूँढ़ते
बाढ़ में बह गये
अपने नीड़
-मंजू कुमार
साँझ की बेला
आकाश का केन्वस
पंछी चितेरे
-मंजू कुमार
परदेश में
अपना सा लगता
पीपल-पेड़
-मंजू कुमार
परदेश में
पराये हुए प्रिय
छूटे अपने
-मंजू कुमार
तेज हवाएँ
ले उड़ीं बादलों को
धरती प्यासी
-मंजू कुमार
पुराने घर
बारिश का मौसम
रिसती छतें
-मंजू कुमार
ताड़ के पेड़
खोज रहीं चिड़ियाँ
फलों के गुच्छे
-मंजू कुमार
सागर तट
दो पैरों के निशान
अकथ कथा
-मंजू कुमार
चाँदनी रात
सागर का किनारा
हाथ पकड़े
-मंजू कुमार