क्षमा की नमी
उडने से रोकती
प्रेम सुगंध
-उर्मिला मिश्रा
रजत-सर्प
उठती लहरों में
जी भर नाचे
-उर्मिला मिश्रा
दूर्वा दल-सा
कट-कट बढता
नारी-जीवन
-उर्मिला मिश्रा
थका डाला है
विचार-ट्रैफिक ने
मानव मन
-उर्मिला मिश्रा
संन्यासी सूर्य
चंदन टीका धारे
बर्फ शिला पे
-उर्मिला मिश्रा
अंजान पथ
पंतग सा जीवन
डोर सहारे
-उर्मिला मिश्रा
हम किनारे
बाँहों में थामे खडे़
युगों से नदी
-उर्मिला मिश्रा
पहाड़ी नदी
जल आचमन को
भेजे बुलावा
-उर्मिला मिश्रा
खिडकी-ओट
बतियाते कई बार
धूप-सखी से
-उर्मिला मिश्रा
नित्य सृष्टि को
उबटन लगाए
स्वर्ण-किरण
-उर्मिला मिश्रा
छूकर आयीं
बादलों के हाथ को
नन्हीं पंतगें
-उर्मिला मिश्रा
मैं रेत-कण
पैर टिका नदी में
द्वीप रचता
-उर्मिला मिश्रा
मैं डगर हूँ
खत्म होती ही नहीं
हौसला देती
-उर्मिला मिश्रा
सदियाँ बीती
लेटे शर-शैया पे
भीष्म तन को
-उर्मिला मिश्रा
शाम हो चली
व्याकुलमना बिल्ली
ऊहापोह में
-उर्मिला मिश्रा
सुनाता रहा
दिन भर के किस्से
मौन आँगन
-उर्मिला मिश्रा
तटस्थ मन
न पानी में उतरा
न मोती लाया
-उर्मिला मिश्रा
कैसे सुनेंगे,
नशे में डूबे लोग
होश की बातें
-उर्मिला मिश्रा
गर्भस्थ शिशु
करता चित्रकारी
माँ के पेट पे
-डा. उर्मिला मिश्रा