मजबूर हूँ
गुलामी में जकड़ा
मजदूर हूँ
-वंदना वात्स्यायन
सिंदूरी नभ
साँझ बनी दुल्हन
फैला आँचल
-वंदना वात्स्यायन
बर्फीली हवा
बिना पूछे आ जाती
काँच को तोड़
-वंदना वात्स्यायन
बर्फीली रात
बिछा गया उजाला
शर्माया चाँद
-वंदना वात्स्यायन
पीली सरसों
ले आया ऋतुराज
रंग उल्लास
-वंदना वात्स्यायन
काँपती धूप
आयी बर्फीले घर
भेष बदल
–वंदना वात्स्यायन
तितली तृप्त
करके मधुपान
फूल बेहाल
-वंदना वात्स्यायन
अमीर तोंद
सदियों से ढो रहा
गरीब पेट
-वंदना वात्स्यायन