सागर चाहे
मिलना बादलों से
उठे, गिरे भी
-सुनीता पाहूजा
जब भी खिलें
हर दु:ख लें हर
गुलमोहर
-सुनीता पाहूजा
रात अँधेरी
चाँद डटा अकेला
पथ का दीप
-सुनीता पाहूजा
प्रेम की यात्रा
होती देह से परे
नेह की प्यासी
-सुनीता पाहूजा
भाषा-संस्कृति
संस्कारों की है खान
भारत देश
-सुनीता पाहूजा
निज भाषा ही
बढ़ाती है विश्व में
हमारी शान
-सुनीता पाहूजा
नदी बताती
महत्व प्रकृति का
सुनो तो सही!
-सुनीता पाहूजा
जीवन देती
पालती है सृष्टि को
माँ-सी नदी
-सुनीता पाहूजा
शीतल रखे
पत्थरों को भी
नदी का जल
-सुनीता पाहूजा
किनारे दोनों
साथ-साथ चलते
मिलें न कभी
-सुनीता पाहूजा
नदी की चाह
रहने न दे प्यासा
कभी किसी को
-सुनीता पाहूजा
अंजान सब!
कहाँ से कहाँ तक
चलती नदी
-सुनीता पाहूजा
शक का बीज
नहीं खिलने देता
रिश्तों के फूल
-सुनीता पाहूजा